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Divy Vsan Bhusan Pahirae(दिव्य वसन भूषण पहिराए) Paperback

Original price was: ₹350.00.Current price is: ₹335.00.

By Prabha Kumari ( प्रभा कुमारी )

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प्रभा कुमारी की औपन्यासिक कृति ‘दिव्य वसन भूषण पहिराये’ जिसमें आस्था, विश्वास और श्रद्धा अनन्त उँचाइयों में निरन्तर चलती रहती है। सदियों से लोकमानस में कथा के रूप में तैरती हुई एक जीवन्त गाथा यानी कथा है सीताराम की और साथ-साथ अनेक पात्रों की जो निरन्तर चलते हैं साक्षी के रूप में जैसे। राम से विलग ना सीता की कथा और सीता से विलग ना राम की कथा पूरी हो सकती है। राम का जन्म, विवाह, वनगमन, लंकागमन और सीता की गर्भावस्था में राज्य निर्वासन के दण्ड की मर्मस्पर्शी कथा जो लोकमानस में सदियों विराजमान है। वाल्मीकि मुनि ने आश्रय दिया था अपनी कुटी में, इसलिये उनके रामायण में सीता की दुःखभरी जीवन-गाथा है। तुलसी कृत रामचरित मानस में यह कथा नहीं है। कहा जाता है देवताओं के अवतार और अवतरणों की आदिहीन, अन्तहीन प्रवाह निरन्तर चलता रहा है कई-कई कालखण्डो को लाँघते हुए। ताड़का-वन, चित्रकूट, दंडक-वन और लंका तक आर्य और अनार्य संस्कृति का प्रभाव अन्तःस्थल में चलता रहा था। दोनों संस्कृतियों में मेल नहीं यानी एक दूसरे के विपरीत थी, जिसे तर्क-विर्तक से कभी पाटा नहीं जा सकता था। सीता का अत्रिमुनि आश्रम में जाना और माता अनसुइया का ‘दिव्य वसन भूषण’ की सौगातें देना ताकि शुचिता बनी रहे वन्य जीवन में। और अग्नि परीक्षा लेने के बाद भी कभी सीता को पवित्र होने का प्रमाण-पत्र नहीं दिया गया था कोसल सम्राट द्वारा। और अयोध्या की प्रजा द्वारा लगाया गया लाँछन से कोसल सम्राट राम ने अपने राज्य से सीता को निर्वासित किया था। इसपर समाज और परिवार के लोग मौन क्यों रहे? राम की समर्पिता, सहयोगिनी, सहधर्मिणी को वन में दुःख भोगने भेजा गया। यहाँ पति द्वारा मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं हुआ? जिस राम के लिये रावण के महल में कभी नही गई थी और अशोक वाटिका में रक्ष संस्कृति के साथ अनेक दुखों को झेलते हुए रही थी। राम तो राजा हुए सीता ने वन के दुःखों को गले लगाया। हमेशा राम का स्वामित्व ही प्रभावी रहा क्यों? इसपर भूमिजा मौन रही क्यों…विरोध के शब्द नहीं थे जीवन के दुःखो के अन्तहीन, आदिहीन सफर में?

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